Tuesday, June 25, 2013

मानवता अब तार-तार है

         मित्रों ! उत्तराखंड की घटना ने एक ऐसा घाव छोड़ा है जो शायद बरसों तक नहीं भर सकता | सबसे ज्यादा दुःख तो तब हुआ जब उस समय की कई घटनाओं के बारे में पता चला | कोई पानी बिना मर रहा था और कुछ लोग उस समय पानी का सौदा कर रहे थे और २०० रुपये अधिक दाम एक बोतल पानी का वसूल रहे थे | कुछ उस समय लाशों पर से गहने उतार रहे थे, और इसके लिए उन्होनें उन शवों की उंगलियाँ काटने से गुरेज नहीं किया | उनके सामने कई लोग मदद के लिए पुकार रहे थे मगर उन्होंने उन्हें अनसुना कर अपना काम जारी रखा | क्या हो गया है हमारे समाज को ? मानवता को ? कुछ पंक्तियाँ अपने–आप होंठ गुनगुनाते गए जिन्हें मैं आप को प्रेषित कर रहा हूँ |
       
मानवता अब तार-तार है, नैतिकता अब कहीं दफ़न है |
बीते पल ये कहते गुजरे, संभलो आगे और पतन है |

लुटे हुए को लूट रहे हैं, मरे हुए को काट रहे हैं;
कुछ ऐसे हैं आफ़त में भी; रुपये, गहने छांट रहे हैं;
मरते रहे कई पानी बिन, वे अपने धंधे में मगन हैं......

जो शासक हैं देख रहे हैं, उनको बस अपनी चिंता है;
मरती है तो मर जाए ये, ये जनता है वो नेता हैं;
आग लगाने खड़े हुए हैं जनता ओढ़े हुए कफ़न है...

भर जाते हैं घाव बदन के, मन के जख्म नहीं भरते;
आफ़त ही ये ऐसी आई, करते भी तो क्या करते;
क्या वे फिर से तीर्थ करेंगे, उजड़ा जिनका ये जीवन है...

23 comments:

  1. ऐसी घटनाएं इंसानीयत खत्म होना बयां करती है। आपकी संवेदनशील आत्म विह्वल हो थरथरा रही है नतिजन चंद शब्दों में आपने समय को बांधा।

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  2. सुन्दर अद्भुत लेखनी को मेरा हार्दिक अभिनन्दन ……

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  3. बहुत सटीक और सार्थक लेखन , अब अगर नहीं सम्हले तो आगे पतन ही पतन है ।

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  4. सचमुच मानवता तारतार है .....सार्थक लेखन

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  5. ऐसे ही परख होती है कि आदमी कितना आदमी है!

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  6. सुन्दर प्रस्तुति-
    बधाई-

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  7. बेहद शर्मनाक घटना की हकीकत को बेहद संजीदगी से शब्दों के मध्यम से व्यक्त है

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  8. गहरा क्षोभ और दर्द लिए है रचना .... शर्म की बात है ... इन्सान कैसे दूसरे की मजबूरी का फायदा उठता है ...

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  9. बेहद शर्मनाक स्थिति...अंतस को झकझोरती बहुत सुन्दर और सटीक प्रस्तुति...

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  10. आखिर ऐसा क्यूँ ?
    बस यही प्रश्न जहन में उठता है
    आखिर मानवता कहाँ चली गई ....
    मर्मस्पर्शी रचना

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  11. आज के हालात पर सटीक रचना ... मानवता नाम का शब्द अब क्या लोगो के शब्द कोष से मिट ही जायेगा ??

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  12. बहुत ही मार्मिक पंक्तियां।

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  13. शर्म की तो बात है ही, पर इन्हें शर्म कहां आती है? बहुत सटीक.

    रामराम.

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  14. man ke jhakhm nahin bharte ....!!
    sach likha hai ...!!bahut sharmanaak laga sab sun kar ,sab padh kar ....!!

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  15. अपनी भावनाओं को बहुत ही सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है आपने..

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  16. उत्तराखण्ड की पीड़ा गीत में उतर आई है।

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  17. इंसानियत शर्मसार है। संवेदनशील कविता में आपने सबकी भावनाओं को रूप दिया है।

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  18. ये घटनाएँ मानवता को शर्मसार करने वाली हैं. क्या कहें.

    बेहतरीन मार्मिक प्रस्तुति.

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