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Sunday, October 26, 2014

श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता/कंचनलता चतुर्वेदी

मित्रों ! मैं आज से एक नै शुरुआत कर रहा हूँ | वह है- पुराने रचनाकारों की रचनाओं को कवितापाठ के जरिये आपतक पहुँचाना | इस क्रम में श्री रामदरश मिश्र जी की कविता श्रीमती कंचनलता चतुर्वेदी के स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ | आशा है पुराने रचनाकारों को सम्मान देने का यह तरीका आपको जरूर पसंद आयेगा |इस रचना का वास्तविक आनंद Youtube पर सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और वहां इसे जरूर सुनें...
 

Tuesday, July 22, 2014

अमर गायक मुकेश के जन्मदिन पर....

मित्रों ! आज मेरे प्रिय गायकों में से एक मुकेश जी का जन्मदिन है | हालांकि मैं इस समय टान्सिल से परेशान हूँ पर पर इस दिन को ऐसे नहीं जाने दूंगा | इसलिए मुकेशजी का ये गीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ....


Tuesday, November 26, 2013

अमर गायक मुकेश और मेरा संगीत

         दोस्तों ! मैं प्रारम्भ से ही मुकेश का बहुत बड़ा प्रशंसक रहा हूँ | बल्कि ये कहिये की मेरी संगीत में रूचि ही मुकेश जी की वजह से प्रारम्भ हुई | एक बार बचपन में उनका गीत रेडियो पर सुना-"जाने चले जाते हैं कहाँ" और अगले ही पल जब उद्घोषक ने ये कहा कि मुकेश जी की पुण्यतिथि पर यह गीत प्रसारित हो रहा है तो मेरे बदन में सिहरन-सी दौड़ गयी थी | तभी मैंने महसूस किया कि वह व्यक्ति जो अब ज़िंदा नहीं है, अपनी आवाज़ के रूप में कितना हमारे करीब है | सच पूछिए तो तभी से संगीत मुझे लुभाने लगा था | अपने पिताजी के डर से और माँ के सहयोग से मैंने चोरी-छिपे बनारस के बुलानाला में स्थित "गुप्ता-संगीतालय" से हारमोनियम और गिटार सीखा | फिर दो साल संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में प० जमुना प्रसाद मिश्र जी से तबला तथा प० जालपा प्रासाद मिश्र जी से गायन सीखा | एल-एल-बी० करने  के कारण गायन अधूरा रहा पर बाद में मैंने संगीत में अपना सीखना जारी रखा, हालांकि यह क्रमबद्ध नहीं हो पाया | संगीत से दूर रहना मुश्किल था, शायद इसीलिये बाद में संगीत की और दो उपाधियाँ मैंने ली |
       मुकेश जी के प्रभाव से संगीत से जुड़ा, इसलिए मैं उनके गीत खूब गाता और गुनगुनाता रहता था | उन दिनों मैं अक्सर मुंशी-घाट पर गर्मियों में नहाने जाया करता था, जहाँ देर तक मैं गंगा जी में नहाता और मुकेश के गीत गाता रहता था | उनके गीतों की और कई खूबसूरत यादें मेरे साथ जुड़ी हुई हैं जिन्हें मैं बाद में आपसे जरूर बताना चाहूँगा | 

Monday, October 10, 2011

जगजीत सिंह- अब तो बस याद ही बाकी है...

एक दर्द, एक आह, एक चुभन, एक कभी न खत्म होने वाला दुख दे गये जगजीत सिंह जी ............। टी वी पर समाचार देखा तो सहसा विश्वास ही नहीं हुआ। पारम्परिक ग़ज़ल-गायकी से हटकर ग़ज़ल को एक नया आयाम देने वाले, ग़ज़ल को एक नई ऊँचाई देने वाले, महान संगीत साधक जगजीत सिंह जी ने दुनिया से कूच करके एक ऐसी रिक्तता दे दी है जिसे भरना शायद नामुमकिन है। अब दूसरा जगजीत सिंह कहाँ मिल सकता है।
             मैं अपने जीवन में दो पुरुष गायकों से बहुत प्रभावित रहा- एक तो मुकेश जी और दूसरे जगजीत सिंह जी। सच पूछिए तो मेरा संगीत में रुझान ही इनकी वजह से हुआ। आज मेरे दोनों आदर्श इस दुनिया में नहीं रहे........यकीन नहीं होता। कुछ साल पहले जब जगजीत सिंह जी बनारस आये थे तो उनको सुनने का मौका मिला था। मुझे एक घटना याद आ रही है। कुछ बच्चे उनसे बार -बार आटोग्राफ ले रहे थे और उनकी भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। उस समय मैनें उनको बच्चों से शरारत करते हुये देखा था। उन्होंने एक बच्चे से कहा- पैसे लाये हो, तभी आटोग्राफ दूँगा। बच्चे ने कहा- नहीं, पैसे तो नहीं हैं। थोड़ी देर तक बच्चा परेशान रहा फिर उन्होंने हँसते हुये अपना आटोग्राफ दिया। सभी हंसने लगे।
             जगजीत सिंह जी के इस दुनिया से जाने के साथ-साथ मेरा भी एक सपना उनके साथ ही चला गया। मैं चाहता था कि मेरी किसी ग़ज़ल को उनकी आवाज़ मिले पर ...............
मेरी ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि..............

Friday, August 21, 2009

बनारस में एक कवि गोष्ठी

दिनांक 20-08-09 को वाराणसी में नई दिल्ली से पधारे श्री अमित दहिया ‘बादशाह’,कुलदीप खन्ना,सुश्री शिखा खन्ना,विकास आदि की उपस्थिति में श्री उमाशंकर चतुर्वेदी‘कंचन’ के निवास स्थान पर एक काव्य-गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमें इनके और मेरे अतिरिक्त देवेन्द्र पाण्डेय,नागेश शाण्डिल्य,विन्ध्याचल पाण्डेय, ,शिवशंकर ‘बाबा’,अख्तर बनारसी आदि कवि मित्रों ने भाग लेकर काव्य-गोष्ठी को एक ऊचाँई प्रदान की।प्रस्तुत काव्य-गोष्ठी के कुछ चित्र मेरे ब्लॉग 'कुछ हमसे सुनो कुछ हमसे कहो' पर देंखे ....

कुलदीप खन्ना,देवेन्द्र पांडे,अमित दहिया'बादशाह' उमाशंकर चतुर्वेदी'कंचन'














शिखा खन्ना और विकास















उमाशंकर चतुर्वेदी'कंचन',विंध्याचल पाण्डेय,प्रसन्न वदन चतुर्वेदी और शिवशंकर 'बाबा'














शिखा खन्ना और विकास













































कुलदीप खन्ना,देवेन्द्र पांडे,














देवेन्द्र पांडे,अमित दहिया'बादशाह'















Wednesday, April 22, 2009

पटरी से की-बोर्ड तक/ प्रसन्न वदन चतुर्वेदी


सोच रहा हूँ कि कहाँ से शुरुआत करूँ।चलिए ब्लाग से ही शुरु करता हूँ।मुझे याद है कि मैं कभी दवात की सहायता से लकडी़ की पटरी पर लिखा करता था।हालांकि ज्यादा दिन ये सिलसिला नही चला था पर कुछ दिन की वो मेहनत बहुत याद आती है।पटरी को बैटरी की कालिख से रंगना,उसे रगड़-रगड़ कर चमकाना,दवात में दुधिया घोलकर उससे लिखना,वो नरकट की कलम......नई पीढी़ ने तो शायद इसके बारे में सुना भी नही हो।
फ़िर स्याही और दवात का लम्बा दौर चला।धीरे धीरे उनका स्थान फ़ाउन्टेन पेन ने ले लिया।मुझे बखूबी याद है कि उस समय हमको बाल पेन से दूर रहने की सलाह दी जाती थी, और कलम दवात के प्रयोग पर जोर दिया जाता था ताकि लिखावट बने।यही नहीं,ये भी कहा जाता था कि यदि बाल पेन{डाट पेन}से लिखा तो परीक्षा में नम्बर नहीं मिलेगा।बाप रे..........वहाँ से मैं कहाँ आ गया ? पटरी से की-बोर्ड तक..........कब आ गया?पता ही नही चला और इतना समय बीत गया...क्या ये वक्त इतनी द्रुत गति से भाग रहा है?
जी हाँ ....भाग तो रहा है पर कुछ नया दे भी तो रहा है।वो स्कूल के दोस्त,फ़िर कालेज के मित्र और अब ब्लाग की दुनिया के इतने प्यारे प्यारे मित्र,शुभेच्छु जो मात्र दिखावे के मित्र नही हैं....उनमें आप की खूबियों पर तारीफ़ करना भी आता है , तो आप की कमियों पर लताड़ लगाना भी।ये वो वास्तविक दोस्त हैं जो सिर्फ़ कहने को नही हैं बल्कि वैसे हैं जैसा उन्हें वास्तव में होना चाहिये।मैं आप सभी ब्लाग मित्रों का बहुत आभारी हूँ जिन्होनें इस एक नयी दुनिया को आबाद कर रक्खा है।मैं इस दुनिया में देर से ही आया पर मैं आया ,मुझे इस बात की बहुत ही ज्यादा खुशी है।इसीलिये तो इच्छा हुई कि आप से कुछ मन की बात कहा भी जाय और मैने ये ब्लाग बना डाला।पर मैं अपने सभी ब्लाग-मित्रों से ये जरूर कहूँगा.....

ना कभी ऐसी कयामत करना ।
दोस्त बनकर तू दगा मत करना।


पूरी ग़ज़ल मेरे ब्लॉग "मेरी गज़लें मेरे गीत"  पर पढ़ें ...
आज के लिए इतना ही........